जुगनू -27-Oct-2025
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"जुगनू "
जुगनू एक सच्चा साथी अंधेरी रातों का!
एक 'हमदर्द,हमसफ़र' अनजानी राहों का!
जुगनू !
आज खो गया कहीं ? दूर ।
रंग-बिरंगी बिजली की इन लाइटों में!
गांव उजाड़ कर बसे इन! 'शहर, महानगरों 'की तंग गलियों में।
छिन्ना"अस्तित्व" बिजलियों के इन्हीं तारों ने !
मोटर कारो की तरंगों ने।
ख़ामोश उड़ रहा जुगनू!
खो कर अपना' मान सम्मान'!
लिए आंखों में दर्द के आंशु!
मौन पड़ी है ज़ुबां।
जुगनू --------------------!
सोच में पड़ी है आज लिए गालों में हाथ!
ग़लती हुई क्या? मुझसे ।
हुई क्या? ख़ता मुझसे।कि स़जा मिली मुझे इतनी बड़ी।
कि लूट गया मेरी" पहेचान "! धक्के मार कर निकाल दिया
लोगों ने! मुझे अपने 'कामों 'से, उजाड़ दिया 'बसेरा' मेरा!
एक वक्त था! जब मैं अंधेरी रातों का था!
एक उम्मीद राह चलते' पथिकों' का !
मेरे सहारे वे पहुंचे थे, कभी ! अपनी मंजिलों तक।
खडा था, मैं" राहगीरों "के राहों में!
लिए हाथों में" दीपों "की माला।
रात की अंधेरी में फैलायी थी! रोशनी बनके दीया।
बिखेरी थी!छटाओं में प्रकाश की लडी ।
जगमगा उठी थी! सुन्नी पड़ी रात!पाके जुगनू का साथ।
इंसानों ने अच्छी कीमत चुकाई!
जुगनू के कामों का ।
लूट ली जुगनू से "आसियाना" उसका!
वो, गांव के बीच में खड़ी बेर,नीम,कटहल पीपल।
शाल,आम, जामुन, करंज केंद से भरा जंगल।
वो झरनों से सज़ी "पर्वत माला" ।
जुगनू "जहां "शान से 'बेफिक्री 'में उड़ उड़ कर
बुन्ना करती थी! "प्रकाश" की चाद़र।
ग़म के बादलों में गुम जुगनू! लिए ह्रदय में 'आघात' के घाव
चुपचाप गुमशुम पंख पसारे उड़ रहा जुगनू -----------।नू जज